बैल सोचता चल रहा, कैसा है इंसान ?
यही ग़नीमत, ना चला, अपना लाद मकान !!
जिस दिन बीट नहीं की हम पर, ऐसा कोई नहीं दिन था !
बुत बोला, कच्छे पहने, होते, तो यह नामुमकिन था !!
जहां पुलिस की खड़ी गाड़ियों, के पहिये चुर जाते हैं !
ऐसे मुल्कों में जाने से, सैलानी घबराते हैं !!
जो घर पे मूंछ, यूं दिखला रहे हैं !
कहीं बाहर से, पिटकर आ रहे हैं !!
सब्जियों की कीमतें, यूं बढ़ रही हैं !
सौ रुपये की गाज़रें यूं पड़ रही हैं !!
महंगाई ने कर दिया, सूक्ष्म बहुत आहार !
देशी घी को सूंघकर, तृप्त हुए परिवार !!
उलझन में हैं, बोल दें, या हों जाएं मूक !
आगे काफी प्रश्न हैं, पीछे है बन्दूक !!