बोलती हैं तस्वीरें
सिर्फ़ दो पंक्तियों के माध्यम से सम्बंधित चित्र को जीवंत बनाने की एक कोशिश.
शुक्रवार, अक्टूबर 07, 2011
गाँधी जी के बन्दर
गाँधी जी के, तीनों बन्दर !
दो हज़ार ग्यारह के अन्दर !!
हौंसले
आँधियाँ हैं, मगर जले देखो !
एक शम्मा के, हौंसले देखो !!
कविता के नाम पर
"सिर्फ़ एक अंतिम कविता" के नाम पर !
दस कवितायें और सुना दीं शाम पर !!
बेशकीमती गमला
बेशकीमती गमला है यह, अपने जीवन से भी प्यारा !
हाथों को चाहें कुछ भी हो, गमला साबुत रहे हमारा !!
सड़क
इसीलिए बनवाई चादर, लम्बी इतनी जान के !
सड़क बनाकर सो जायेंगे, लम्बी चादर तान के !!
तो क्या करें ??
सड़कों पे बाढ़ सबको, रुलाये तो क्या करें ?
पानी निकल के चित्र से, आये तो क्या करें ??
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नस्लभेद
पशुओं में तो यह बिलकुल ही, कम बतलाया जाता है !
नस्लभेद का मुददा, इंसानों में पाया जाता है !!
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